Saturday, November 3, 2012


      (गजल )

   मेहदी सुख गए उस रात  के तो क्या हुआ 
   लाली आज भी है।।
   बदलने लगे इसरो  की मायने तो क्या हुआ
   नजदीकियां  आज भी है।।
   सुख गए है ओ गजरे तो क्या हुआ 
  तेरे इबादत में कुसुम आज भी है।।
  वकत ने दुरी कर दी तो क्या हुआ 
 तेरे होठो का एहसास आज भी है।।
 कुछ इसारे कवी न बदलते, 
 मैं तो आज भी लता हु गजरे 
बाकि खुसबू आज भी है।।
                     <मनोहर  कुमार झा >


  प्यास (कबिता)

सुबह चाय से अधिक्  प्यारी लगती  है तेरे होठो की गर्म हवा 
भले सुसक रह जाये पूरा दिन 
पर शाम  को 
तुम्हारा मेरे आने से ठीक कुछेक छन पहले का दरवाज़ा खोलना 
आज भी पार्क में तेरे सरमाने से कुछ कम नहीं लगता 
साडी हरारत हो जाती है ख़तम 
और मै अबिरल निहारने लगता   हूँ 
तेरा मुख चंद .............

                          <मनोहर  कुमार झा >

Friday, November 2, 2012


      ओ हिस्सा (कबिता)

सोचता हूँ वक्त हर घाव भर देता है क्या 
पर नहीं ये तो मन का एक भाव है 
जो बहलाने का ओजार देता है 
प्रिये ,
तीज हो या पूर्णिमा की रात
तपती धुप या सावन का मेघ ......
जब भी तुम्हारी हिचकिया उठती है 
मेरी  साँसे मेरा साथ छोरने लगती है .
उठने लगती है हजार सवाल 
मेरे तेरे वादे 
क्या गली के नुकर पर मिल जाएँगे खजाने 
क्या देह और मेह के गंध एक से होते  ?
फुट फाथ पर खोजता हूँ 
रिश्ते का एहसास 
एक बच्चा  अपने गोद में एक छोटे को ले कर आ पंहुचा 
एक रोटी दे दो पलीज़
उठने लगते है  अनगिनत सवाल 
बाइपास के इस सरक पर  
झहर परते आसू की बुँदे 
 मैं
खोज रहा हूँ 
अपने धागे का ओ टुटा हिस्सा ------------- 
                                                          " मनोहर कुमार झा "
                                            

Thursday, December 29, 2011

आवास  (कबिता )
ना रहना  था साथ मेरे तो
काहे दिखाई  सपना
घोसले का
चली जाती चुप चाप
कहीं  बहुत दूर
थोरा सोचती
मेरे बारे में  भी
मेरे घोसले के
अंडे पर तरस  खाती
ना तोरती  उससे  भी
मुझसे नाता
जब ओ बहार  आता 
जी लेते अपने  घोसले
अपने उसी नबजात
के संग
बची रह जाती मेरी
लालसा
साथ होती तेरी  यादें
और तेरा हिस्सा
भले अधूरा होता
मेरा ओ घोसला
पर बच  जाता
हमारा सपना ,
और होती  एक सुकून
उसके साथ अपने
आवास  में  !!
:::'''      <कुसुम के लिये >
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-----मनोहर कुमार झा


 

क्लैमेक्स (कबिता)
वह कौन था
पता नहीं
सुबह आता
देर संध्या तक कुछ न कुछ काम
कर कर चला जाता था
बार दूबर था 
सबकी घुरकी सुनता
रासन की  पंक्ति से
टाइम कल की  लाइन तक
पुराने गुलाब की तरह
मरोरा  जाता
         सहसा ,
                वह जागता है
                कुछ ..........
                गोंघा कैरियर
               मूक कर देता है
पता नहीं
       फिर क्या हुआ
  फिल्म का
एक  गर्द गुबारा
गुम हो गया
एक जमी एक आसमा के लिये !
                            ---------मनोहर कुमार झा

Wednesday, December 28, 2011

आभास ( कबिता )


कौन कहता है प्यार दे जाओ
कौन कहता  है ये संसार दे जाओ
जरुरी तो नहीं की तुम भी प्यार करो
भटकू मयखाने में या कुरेदान में
बस तेरा आभास मिल जाए
कौन कहता  है की प्यार दे जाओ !!

प्रचंड पछबा में मचलने दो
पहाड़ो  पर टूटती  है सांसे तो टूटने दो
रुक जाय समय तो मुझे चलने दो
कौन कहता  है प्यार दे जाओ
बस तेरा आभास मिल जाए कौन कहता है की प्यार दे जाओ !!

नदी नाहर लाँघ आया हूँ 
सुख गए हें होठ
पर, तू कह दे तो फराक
इतिहास लिख जाऊ
कौन कहता है प्यार दे जाओ
ऐ खुदा '
बस उसे भी मेरा आभास मिल जाए !!!
                                                             मनोहर कुमार झा .


गजल

हँ हँ हम शेर केर गीदर होएत देखने छी.
हँ हँ हम मर्म के जर्म होएत देखने छी .

हँ हँ चुप -चाप माँ -बाप कुसुम सन
बेटाक बोल गर्म होएत देखने छी .

हँ हँ बोलक अक्रन में बकलोल
बापक नयन में नोर होएत देखने छी .

हँ हँ गुम गुरु सीतल सोनीत
मरचाई  नरम होएत देखने छी .

हँ हँ बेरथ चुप मनोहर आए
रिस्ताक जहर होएत देखने छी ..

                                मनोहर कुमार झा .